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भाग्य! / वाल्टर सेवेज लैंडर / तरुण त्रिपाठी

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और बस थोड़ा ही कुछ है माँगना
संक्षेप में, कि आगे जब मैं नहीं रहूँगा
तो काम तुम्हारे ध्यान में अपने टाँगना

तब भी अगर रहे वो पृथ्वी पर
जिसका प्रेम हो बिल्कुल बीते कल सा
कानों में कहना उसे, ओ प्रिय भाग्य!
कि प्रेम भी नहीं रहना चाहिए बना

कहना उसे छोड़ गया हूँ शोरगुल
से भरा यह जीवन, ज़रा थक-ऊब कर
आनंद में तो जिसके कुछ ही रहते हैं
और बाकी तो अवांछित ही अधिकतर

कहना उसे संभली गति से वो आये
जहाँ प्रतिष्ठायें लेटी हैं मेरी
और कब्र को पहुँचने लगे आहें उसकी
तो सबसे ताज़े फूल डाले कब्र पे मेरी

कहना उसे खड़ी रहे वो उस दिन
औरों से कुछ कदम दूर जा के
और थाम ले वो आँसू (अगर बहने ही लगें)
जो कीमती हैं, मिट्टी में न मिलें वे..