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गुरु-दिवस / मृत्युंजय
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मौत की गन्ध भाँप मुर्गे पँजों से जाली जकड़ लेते हैं
चींटियाँ जहरीली गन्ध सूंघ कुनबे को ख़बरदार करतीं नया रास्ता बना लेती हैं
क्रूरता भरी नज़रों को सेकेण्ड के सौवें हिस्से में भाँप जाती हैं स्त्रियाँ
मवेशियों की पीठ पर बैठी चिड़िया कीचड़ लिपटी पूँछ से बचाव में थोड़ा-थोड़ा उड़ जाती है
स्पर्श में भरे अपमान को सबसे बेहतर समझते हैं बच्चे
सीने में सरिया लेकर भी सुअर भागती है कोसों
ततैया का ज़हर निकालकर उड़ा देते हैं छोकरे
मृतात्माओं का बोझ कन्धे पर लाद इनसाफ़ के लिए लड़ते हैं लोग
सीखने को कितना कुछ है इस कठिन समय में ।