Last modified on 18 अगस्त 2008, at 19:34

तुम आज लिख लो / महेन्द्र भटनागर

Pratishtha (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:34, 18 अगस्त 2008 का अवतरण (New page: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=महेन्द्र भटनागर |संग्रह= जिजीविषा / महेन्द्र भटनागर }} ...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

तुम आज लिख लो —
कि थोड़े दिनों में
हज़ारों युगों की
पुरानी, सड़ी
दासता की इमारत बड़ी
भूमि पर लोटती
भग्न बिखरी मिलेगी !
अनेकों बरस से
ग़रीबों, किसानों
मजूरों व श्रमिकों के
ताजे़ रुधिर से
सनी वाटिका
पूर्ण उजड़ी मिलेगी !
दमन के धुएँ से
नयी आग बन कर
गगन में लहरती दिखेगी !

कि जिससे
लुटेरों के डेरे मिटेंगे,
व जिनकी सबेरे-सबेरे
हवा में बुझी राख उड़ती दिखेगी !