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मन मगन हो गया / दीनानाथ सुमित्र

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पुष्प वन हो गया, मन मगन हो गया
उनको छू कर मेरा दुख शमन हो गया
 
देह में नेह है, नेह में है जगत
यह हुआ ही नहीं है कभी गत-अगत
देखते-देखते सच सपन हो गया
पुष्प वन हो गया, मन मगन हो गया
उनको छू कर मेरा दुख शमन हो गया
 
कुछ बुरा है कहाँ? सब भला ही भला
सीखनी ही पड़ी सबको जीवन- कला
जिसने सीखी कला वह सुमन हो गया
पुष्प वन हो गया, मन मगन हो गया
उनको छू कर मेरा दुख शमन हो गया
 
जिंदगी का मजा जिंदगी जानती
गम के सँग हो सदा, यह खुशी जानती
जिंदगी का ही मैं आवरण हो गया
पुष्प वन हो गया, मन मगन हो गया
उनको छू कर मेरा दुख शमन हो गया
 
लोग कहते रहे, लोग सुनते रहे
दुख को बुनते रहे, सुख को बुनते रहे
फूल काँटों से मिल मैं चमन हो गया
पुष्प वन हो गया, मन मगन हो गया
उनको छू कर मेरा दुख शमन हो गया