ध्वस्त कर रहे मर्यादा ,मन में कुंठा भारी है।
सत्ता लोलुप चाह बड़ी,तृष्णा मन पर भारी है ।
प्रतिकारों की आँधी में,मर्यादा को भूल गये।
स्वार्थ साधना शेष रहा,बढ़ती यह दुश्वारी है ।
अन्तर्द्वंद्व करे खोखला, होता जब कुंठित तनमन
कारण का निस्तारण भी,दूर खड़ी बेचारी है।
शुद्ध नीति हो राजनीति,अद्भुद यह होगा मंथन,
सिंहासन बत्तीसी के, प्रश्नों पर सत्ताधारी ।
हार जीत हो छलबल से,न्याय नीतियाँ ध्वस्त जहाँ,
निज स्वार्थ से ऊपर उठना,यही बनी लाचारी है।