Last modified on 16 नवम्बर 2022, at 19:42

मैंने हथेलियों में तुम्हारी / सांत्वना श्रीकांत

वीरबाला (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 19:42, 16 नवम्बर 2022 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=सांत्वना श्रीकांत }} {{KKCatKavita}} <poem> मुस...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)

मुस्कुराहट रखी
उसने जवाकुसुम का आकर धर लिया
मैंने अपने हृदय में अंकित-
तुम्हारे प्रेम का
आकर नापने का प्रयत्न किया
वह अनेका- अनेक ऊवाच लिपियों में परिवर्तित हो गया,
मैंने तुममें स्वयं को निहारा
तुम ओस, धूप, प्रपात,नदियों से
पृथक् कर समेट रहे थे मुझे,
तुमने इस क्रम में
दूब पर पड़ी ओस को समेटा
उस पर बने इंद्रधनुष को और परिष्कृत किया
'धूप के कण' की ऊर्जा माथे पर मली
नदियों से उत्साह मांगा
और तुममें मै उतर गई....