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हम सब मनुष्यक उत्तरपुरुष / उदय नारायण सिंह 'नचिकेता'

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हम सब थिकहुँ मनुष्यक उत्तरपुरुष;
मनुष्य थिक बानरक उत्तरपुरुष।

नागरिक सभ्यताक वरदान-
हमरा सभक मानवीय वृत्तिकें धोखारि कए बहा देने अछि।

मानव-मनक विस्तीर्ण क्षेत्र
उड़ि गेलैक अछि
ऐटम आ हाइड्रोजन बम मे।
तकर स्थान में काज करैछ ऑटोमेशन आ कम्प्यूटर।

हमरा सबकें सोचबाक ज़रूरत नहि;
हमरा सबकें काज नहि करै पड़ैछ।

तैयो,
असीमक सीमाकें-
हमरा लोकनि अतिक्रान्त नहि केने छी।
आनन्दक आन्दोलन में देह कें भसिया नहि देने ही ।

हमरा सबकें केवल परिकल्पना करै पड़ैछ
कोनोटा पंचवार्षिक,
कोनो सहस्रवार्षिक ।
तकरा रूपावित करत यन्त्र।
ताहि लेल हमरा सबकें चिन्ता नहि।

असल बात
हमरा सबकें कोनो चिन्ते नहि अछि।

हमरा सबकें उत्पादन नहि करै पड़ैछ,
दस बजे सँ पाँच बजे धरि, आफिस नहि करै पड़ैछ।
हमरा सबकें खैबाक प्रयोजन नहि, देखबाक प्रयोजन नहि,
सुनबाक प्रयोजन नहि,
बुझबाक प्रयोजन नहि;
हम सब जन्मैत नहि छी,
मरैतो नहि छी;
जे किछु करबाक अछि,
यन्त्र करैत अछि ।

हम सब केवल बैसल रहैत छी। नहि,
सेहो ठीक नहि ।
हम सब बैसतो नहि छी,
ठाढ़हु नहि रहैत छी।
हम सब मनुष्य छी- शायद !
जाय दियौक,
ताहि सम्बन्ध में चिन्ताक की प्रयोजन ?
निर्लिप्तताहुक प्रयोजन नहि,
यन्त्र त अछिये !