भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

तमन्ना जब हक़ीक़त से लड़ी है / प्रेम भारद्वाज

Kavita Kosh से
द्विजेन्द्र द्विज (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 20:28, 17 मई 2009 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=प्रेम भारद्वाज |संग्रह= अपनी ज़मीन से }} [[Category:ग़ज़...)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

तमन्ना<ref >कामना </ref > जब हक़ीक़त<ref >यथार्थ </ref > से लड़ी है
दिले-नादान<ref>भोला दिल </ref> के सिर आ पड़ी है

कभी गौरी जो गंगा से लड़ी है
पड़ी शिवजी को फिर मुश्किल बड़ी है<ref >एक लोककथा प्रसंग</ref >

वली<ref >महात्मा </ref > जो हैं ,छुएँ आकाश बेशक
नज़र उनकी तो धरती पर गड़ी है

रहे बचपन पे भी काबू बुज़ुर्गो
इसे होना बुढ़ापे की छड़ी है

ये रोशन क्या बुढ़ापे को करेगी
तुम्हारे हाथ में जो फुलझड़ी है

शराफ़त यूँ है जैसे एक लड़की
भरे बाज़ार में तन्हा खड़ी है

निकलने प्रेम से थे हल तो बेहतर
यहाँ लोगों की उल्टी खोपड़ी है.

शब्दार्थ
<references/>