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मलयानिल नाचा करती है / देवेन्द्र आर्य

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जब से जग के दुःख-दर्दों का
फूलों से शृंगार किया है
तब से मेरे मन-आँगन में
मलयानिल नाचा करती है ।

पर्वत जैसी पीर हुई, पर
मैंने उसको तन पर झेला
झंझाओं के विकट व्यूह में
मैं आखिर तक लड़ा अकेला ।

जब से तपन जेठ की लेकर
घन-सावन से प्यार किया है
तब से वासंती मनुहारें
मधुर छंद बाँचा करती हैं ।

जो भी मिला सभी का माना
विष तो क्या अमृत ही बाँटा
कभी न सोचा इस विनिमय में
कितना लाभ कि कितना घाटा ?

जब से पर्वत सा मन लेकर
क्षितिजों को विस्तार दिया है
तब से जीवन की क्षमताएँ
पग-पग को साँचा करती हैं ।

संबंधों के लिए आज तक
सम्मानों के दीप जलाए,
घोर वर्जना, अविनय के पथ
मैंने अनगिन जाल बिछाए ।

जब से तम से रण करने में
मैंने मन-दिनमान दिया है
तब से जग की उज्ज्वल आशा
रह-रहकर जाँचा करती है ।