Last modified on 14 दिसम्बर 2020, at 22:59

अन्न के ढेर लगाता हुआ / प्रयाग शुक्ल

जल के साथ जल हूँ,
खेतों तक उसे लाता हुआ ।

बीज के साथ बीज हूँ,
उसे उगाता हुआ ।

हवा के साथ हवा हूँ,
फ़सल के साथ लहराता हुआ ।

धूप के साथ धूप हूँ,
धान पकाता हुआ ।

ठण्ड के साथ ठण्ड हूँ,
पहरे पर जाता हुआ ।

दिन हूँ, रात हूँ,
सुबह दुपहर शाम हूँ,
अनथक बेचैन हूँ,
आपका और अपना चैन हूँ,
अन्न के ढेर लगाता हुआ ।

नन्हे दुध-मुहों के मुँह से
बूढ़े बुज़ुर्ग-मुहों तक
मैं ही तो हूँ,
दुखी या मुस्काता हुआ ।