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अफीम का बेटा / आर्य भारत

जब भी तुमसे प्यार की दो बात,
करने की लिए,
मैं सोचता हूँ,
याद आता हैं मुझे अपना -
सुनहला गाँव,
बरगद,नीम,जामुन,
आम,महुएं की कतारें,
ताल,बांगर,बांध,पोखर,
और अखाड़े
में सीखे वो दाव सारे,
याद आतें हैं हिरामन जो खड़े मेरे दुआरे,
दे रहें हैं कल दियारे की नीलामी की कोई अधिसूचना,
याद आता है मेरा स्कूल,
मेरी क्लास,
जिसमें-
"क्या तुम्हारे काम करते हैं पिताजी?"
प्रश्न ये मास्टर जी द्वारा पूछना,
मैं बताता हूँ की "सर किसान है वो"
और मन में फूट पड़ता हैं धुँआ,
चिलम से गांजे का,
बरसने लगते है मेरे बालपन पर
वो अफीमी आग्नेयास्त्र
जो,नागासाकी पर गिरने वाली मिसाइलों से जरा भी कम नही होते,
मैं तुमको क्या बताऊ
तब यही मैं सोचता हूँ,
काश तेरी जिन्दगी में हम नही होते,
तुम्हे मालुम हैं?
मुझको,मेरे गाँव में,
कहते बुलाते किस तरह हैं?
सभ्यता के इस सुनहले से शिखर पर विराजे,
मैं अपने बाप को पापा नही कहता,
न ही पिता जी कहता हूँ,
न ही बाबूजी,
बस यही सुनता हूँ लोगों से,
अबे ओ मुननवा का बेटा,
और साला मार कर मन,
मान लेता हूँ,
"मैं हूँ अफीम का बेटा"
अफीम क्या होता हैं ?
कैसा रंग होता है?
नहीं मालुम मुझको
बस तुम्हारी आँख में जब झांकता हूँ,
या तुम्हारा हाथ पकड़े,
चाँद-तारे ताकता हूँ,
याद आता हैं मुझे अपना सुनहला गाँव जिसके,
उत्तर में कबीरा वाला ताल हैं,
जिसके दक्खिन में,
पुड़ीयों वाला बिकता 'माल'है,
उस ताल से इस माल की दुरी
कोई दो-ढाई मील होगी,
और इन्हीं एक फांसलों में
दौड़ती पापा की 'हीरो'साइकिल होगी,
जो मेरे ख्वाब की पगडंडियो पर लडखडाती है,
जिसके आने की सुन आहट,
मेरी माँ की कलाई,चूड़ियाँ,
सब टूट जाती हैं,
तुम्हे मालुम है अफीम की कीमत?
नही न?
मुझे मालुम है,
दो-चार बिस्वा नही
पुरे पच्चीस बीघे
माँ के जेवर,घर के बर्तन
मेज,कुर्सी,गद्दे,गलीचे,
सब अगर बिक जाए तो तय्यार रहता है,
मेरी माँ का सिन्होरा,
और राशन कार्ड से कट जाता है
अफीमची का हरेक ब्यौरा,
पर नही कटता,
न ही घटता है,
अफीम का अपना जहर,
अफीमची के बाद भी रहता है मेरे नाम पर उसका असर