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अब वापसी का मन है / कविता भट्ट

पहाड़ी नदी जो देती है संदेश-
बस बहते ही रहने का
किसी भी परिस्थिति में;
लेकिन यह सन्देश अपनाकर
चली गई मैं अपने उद्गम से बहुत दूर!
अब वापसी का मन है उद्गम की ओर-
नदी को साक्षी बनाकर
लम्बी बातें करनी हैं अपने आपसे मुझे।
पहाड़ी नदी के किनारे
समतल चट्टान पर लेटकर
सुस्ताने का मन है अब।
नीले आकाश और उसकी गोदी में
अठखेलियाँ करते बादल-
आत्मा के अंक में भटकते
मन का प्रतिबिंब लगते हैं।
चाहती हूँ हलचल शांत हो जाए अब
इसीलिए अब नदी से बहना नहीं;
अपितु एक गहरे सरोवर की भाँति
शांत और स्थिर होने का कौशल सीखना ही
मेरी पहली प्राथमिकता है।
ताकि लौट सकूँ अपने उद्गम की ओर।