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अमलतासों से खिले संबंध / योगेन्द्र दत्त शर्मा

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कसमसाई है लता की देह
फागुन आ गया!

पारदर्शी दृष्टियों के पार
सरसों का उमगना
गंध-वन में निर्वसन होते
पलाशों का बहकना

अंजुरी भर-भर लुटाता नेह
फागुन आ गया!

इंद्रधनुषी रंग का विस्तार
ओढ़े दिन गुजरते
अमलतासों-से खिले संबंध

फिर मन में उतरते
पंखुरियों-सा झर गया संदेह
फागुन आ गया!

एक वंशी-टेर तिरती
छरहरी अमराइयों में
ताल के संकेत बौराये
चपल परछाइयों में

झुके पातों से टपकता मेह
फागुन आ गया!

नम अबीरी दूब पर
छाने लगा लालिम कुहासा
पुर गया रांगोलियों से
व्योम भी कुंकुम-छुआ-सा

पुलक भरते द्वार, आंगन, गेह
फागुन आ गया!