भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
असमान / सुरेन्द्र रघुवंशी
Kavita Kosh से
कई बार दिमाग के अन्धेरे में एक साथ
अनगिनित प्रश्न कौंधते हैं
कुछ चमकता है अक्सर
और बहुत कुछ रह जाता है अन्धेरे में
अन्धेरे के आवरण से ढकी हैं
सबसे सुन्दर चीज़ें
सबसे सुन्दर क्षण बह गए गलियारों में उपेक्षित
सभी पौधों को सामान कतार में
एक साथ नहीं रोपा गया
विश्व की हरीतिमा का भविष्य हैं जो
उनमें से अधिकांश को न पर्याप्त जगह मिल रही है
और न खाद-पानी अपेक्षाकृत
समुचित उन्नति के दावों के बीच
उदास और मुरझा रही शुरूआत
प्रश्नों की झड़ी लगा रही है
पर उँगलियाँ भी कोई चीज़ हैं
जिन्हें कानों में डालकर बचा जा सकता है
वहाँ से गुजरते समय
अपनी ज़िम्मेदारी को धूल की तरह झटकारते हुए