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कुएँ की पेंदी सी / दिनेश कुमार शुक्ल

कुएँ की पेंदी में पड़े-पड़े
दिखता है जितना भी थोड़ा आकाश
उतने में ही
आ बसती है संसार भर की आशा

उतने ही आकाश में वहीं आकर चमकता है धु्रवतारा

सारी दुनिया की पतंगें
उड़ते-उड़ते वहीं आ जाती हैं

किन्तु काई-फिसलन भरी
हरी-हरी दीवारें कुएँ की
घेर-घेर गिनती हैं
जीवन की एक-एक धड़कन
जैसे गिनता है सूम
दान के दाने,
जैसे गिनता है जल्लाद
फंदा खींचने के पहले
घड़ी की एक-एक टिक-टिक...