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ख़ाक जब ख़ाकसार लगती है / बशीर बद्र

ख़ाक जब ख़ाकसार लगती है
किस क़दर बावकार लगती है

ख़ून पानी बना के पीती है
धूप सरमायादार लगती है

सब्र कर सब्र करने वालों की
बेबसी शानदार लगती है

अब बुझा दो हमारी आँखें भी
रोशनी नागवार लगती है

आजकल मेरे पाँव के नीचे
कोई शय जानदार लगती है

सिर्फ़ अख़बार पढने वालों को
ज़िंदगी इश्तिहार लगती है