देखि सखि चंदा उदय भयो।
कबहूँ प्रगट लखात कबहुँ बदरी की ओट भयो।
करत प्रकास कबहुँ कुंजन में छन-छ्न छिपि-छिपि जाय।
मनु प्यारी मुख-चंद देखि के घूँघट करत लजाय।
अहो अलौकिक वह रितु-सोभा कछु बरनी नहिं जात।
’हरीचंद’ हरि सों मिलिबे कों मन मेरो ललचात॥
देखि सखि चंदा उदय भयो।
कबहूँ प्रगट लखात कबहुँ बदरी की ओट भयो।
करत प्रकास कबहुँ कुंजन में छन-छ्न छिपि-छिपि जाय।
मनु प्यारी मुख-चंद देखि के घूँघट करत लजाय।
अहो अलौकिक वह रितु-सोभा कछु बरनी नहिं जात।
’हरीचंद’ हरि सों मिलिबे कों मन मेरो ललचात॥