ना जाने किनसे रुष्ट हो -
रोकर अपनी बात समझाना चाहती हो,
लेकिन किन्हें?
सामने तो पत्थर हैं
और पता ही होगा-
पत्थरों में
न रक्त, न धमनियाँ, न शिराएँ
न हृदय, न मन, न ही आत्मा
इसीलिए तुम अब
अँधेरों में खो जाओ कविते!
संभवतः नियति यही है।
ना जाने किनसे रुष्ट हो -
रोकर अपनी बात समझाना चाहती हो,
लेकिन किन्हें?
सामने तो पत्थर हैं
और पता ही होगा-
पत्थरों में
न रक्त, न धमनियाँ, न शिराएँ
न हृदय, न मन, न ही आत्मा
इसीलिए तुम अब
अँधेरों में खो जाओ कविते!
संभवतः नियति यही है।