बकैती / सन्नी गुप्ता 'मदन'
राजनीति के चर्चा करत बा उहौ,
जेकरे दुइ जून खाई के खर्चा नहीं।
लीक करवाई देहै परीक्षा सुना
जेकरे लीखै के आवै न पर्चा सही।।
अपने मन कै हरावै जितावै लगै,
सोइ उठकै उ माठा भुजावै लगै।
वोट मेहरी के वनका मिलै न मिलै,
मंतरी संतरी का बनावै लगै।।
बाट डारे उ नेउता जवारी भरे,
जेकरे खाहू के घर मा बा मर्चा नहीं।
यनके मेहरी का देखै निहारै बहू,
का हो मालकिन सुने हमका ऐसे कहू।
वनके बिटिया पतोहे के चिंता बड़ा,
बेटवा आपन भले पी के नालिम पड़ा।।
देश भर कै बकैती सुनावत हये,
दाल रोटी के कौनो बा चरचा नहीं।
बेवजह यनका वनका शरापत हये,
जे खवावै यनहै नीक ऊहै भये।
भै बड़ा नीक यनके हिसाबे सुना
जौन पिछले महिनवा म वै मरि गये।।
पंडिताई करै लाग बाटै उहौ।
जेकरे भय खानदाने मा अर्चा नहीं।।
का हो मझवा मा तोहका बा केतना मिला
उ फलाने के सरसों बड़ा बा खिला।
ध्यान द्या देखा उ मेड़ काटत हये
जौ न मानै तो लै जा तुहू काफिला।।
देश भर कै छोड़ावत हये यै लकिन
अपने देही कै छूटत है मुर्चा नहीं।।