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यह कौन दस्तक दे गया / ओम निश्चल

यह कौन दस्तक दे गया
इतनी सुबह इतनी सुबह ।

आँखों में सपने बो गया
इतनी सुबह इतनी सुबह ।

थी नींद आँखों में बसी
था रात का चौथा पहर
हर सिम्त ख़ामोशी यहाँ
सोया हुआ पूरा शहर

कोई सुखद-सी कल्पना
कर गई कवितामय सुबह ।

था गुनगुनाता-सा कोई
कुछ स्वप्न थे कुछ बिम्ब थे
सुधियों के फ़्रेमों में जड़े
भावों के कुछ प्रतिबिम्ब थे

इक लहर-सी आई तभी
धो गई मन की हर सतह ।

पूछा किसी ने क्या मेरी
भी याद आती है कभी ?
इस भुवन में मेरी कमी
तुमको है तड़पाती कभी ?

मेरे बिना होती तुम्हारी
रात की कैसी सुबह ?