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वसन्त विदाय / ऋतु रूप / चन्द्रप्रकाश जगप्रिय

दू महिना रही केॅ
आखिर लौटी गेलै वसन्त
खूब गमकलै अमराई
खूब गमकलै महुआ वन
केन्होॅ-केन्होॅ फूलोॅ के इत्र लगैनें
ऐलोॅ छेलै वसन्त
कि चारो दिश अभियो भी हवा मेॅ
कुछ-कुछ होनै छै खुशबू।

अभी होने मतैलोॅ छै
कदली वन
मतर कहिया तक?
लौटी गेलै वसन्त
फेनू सेॅ आवै के ढाढ़स देतेॅ
सबके रस-मनुहार लेतेॅ।