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|रचनाकार=शहबाज़ 'नदीम' ज़ियाई
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मेरी ख़्वाहिश के मुताबिक तिरी दुनिया कम है
और कुछ यूँ है ख़ुदा हद से ज़ियादा कम है

सर-ए-अफ़्लाक जो रौशन था सितारा कम है
ऐसा लगता है मिरी ज़िस्त का अर्सा कम है

तुझ से मिल कर मुझे मायूसी हुई है जानाँ
जैसा सोचा था तिरे बारे में वैसा कम है

कुछ तो क़िस्मत की ख़राबी ने खिलाए हैं गुल
और कुछ अपने लिए मैं ने भी सोचा कम है

गुफ़्तुगू तारों से करते हुए गुज़री है रात
मेरे हमराह मिरा चाँद भी सोया कम है

कहीं ऐसा तो नहीं रूठ गया हो मुझ से
अब के परदेस में वो ख़्वाब में आया कम है

अभी आसार-ए-क़यामत से है दुनिया महफ़ूज़
अश्क़-अफ़शानी अभी दीदा-ए-गिर्या कम है

उस के कानों में है पिघला हुआ सीसा ‘शहबाज’
आज कल वो मिरी आवाज़ को सुनता कम है
</poem>
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