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|रचनाकार='महशर' इनायती
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किसी की आँखों का ज़िक्र छेड़ें अजीब कुछ पुर-वुक़ार आँखें
मगर ख़ुदा वास्ता न डाले बड़ी ही बे-ऐतबार आँखें

नुमाइशी रस्म-ए-पर्दा-दारी रहेगी जब तक तो ये भी होगा
नक़ाब सरकेगी जब ज़रा भी उठेंगी बे-इख़्तियार आँखें

जहाँ जहाँ रब्त-ए-चश्म-ओ-दिल है वहाँ वहाँ बात चल रही है
नहीं तो बज़्म-ए-क़मर-वशान में हज़ार दिल हैं हज़ार आँखें

नक़ाब उट्ठी तो अपना आलम न तर्क-ए-जलवा न ताब-ए-जलवा
नज़र उठी बार बार लेकिन झपक गईं बार बार आँखें

नज़र मिला कर नज़र बचा कर नज़र बदल कर नज़र चुरा कर
नमूना बन बन के कह रही हैं हक़ीक़त-ए-रोज़-गार आँखें

किसी से इज़हार-ए-मुद्दआ पर मेरा वो ख़ौफ़ ओ हिरास ‘महशर’
किसी की वो तेज़ तेज़ साँसे किसी की वो बे-क़रार आँखें
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