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07:11, 18 अगस्त 2013 {{KKGlobal}}
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|रचनाकार='महशर' इनायती
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क्या क्या हैं एहमितात मगर देखिए अभी
हो तो गई है शाम मगर देखिए अभी
आग़ाज-ए-बज़्म-नाज़ निहायत नज़र-फ़रेब
अंजाम ना तमाम मगर देखिए अभी
सहरा-ए-नज्द तीशा ब-दोशी फ़राज़-ए-दार
अपने कहाँ मक़ाम मगर देखिए अभी
सुनते तो रहिए राह-बर-ए-कारवाँ का क़ौल
मंज़िल है चंद गाम मगर देखिए अभी
ख़ून-ए-वफ़ा फ़ुज़ुल मगर रंग लाएगा
क़ातिल है शाद-काम मगर देखिए अभी
आ तो गई समझ में शराब-ए-नज़र की बात
छलके नहीं हैं जाम मगर देखिए अभी
</poem>
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