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|रचनाकार='महशर' इनायती
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सब ने बना बना के तमाशा हमें तुम्हें
हैरत हुई जो ग़ौर से देखा हमें तुम्हें

दुनिया ने बार बार पुकारा हमें तुम्हें
क्या दौर था के होश नहीं था हमें तुम्हें

जब एक दूसरे में न बाक़ी रही तमीज़
हर शख़्स फिर मिसाल में लाया हमें तुम्हें

आईना-ए-ख़ुलूस पे पड़ती नहीं है गर्द
ताने भी हो गए हैं गवारा हमें तुम्हें

मुँह तक रही थी गर्दिश-ए-दौराँ क़दम क़दम
बस आ गया था ख़ैर से जीना हमें तुम्हें

‘महशर’ की तरह वो तो असर ही नहीं लिया
रहने न देती चैन से दुनिया हमें तुम्हें
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