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15:58, 27 अगस्त 2013 {{KKGlobal}}
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|रचनाकार=कामिल बहज़ादी
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<poem>
ये किस ने दूर से आवाज़ दी है
फ़ज़ाओं में अभी तक नग़्मगी है
सितारे ढूँडते हैं उन का आँचल
शमीम-ए-सुब्ह दामन चूमती है
तअल्लुक़ है न अब तर्क-ए-तआलुक़
ख़ुदा जाने ये कैसी दुश्मनी है
रिदा-ए-ज़ुल्फ़ में गुज़री थी इक शब
मगर आँखों में अब तक नींद सी है
मिरी तक़्दीर में बल पड़ रहे हैं
तिरी ज़ुल्फ़ों में शायद बरहमी है
</poem>
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