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बीती ताहि बिसारि दे / गिरिधर

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|रचनाकार=गिरिधर
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[[Category:कुण्डलियाँ]]{{KKCatKundaliyan}}<poeM>बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेइ।
जो बनि आवै सहज में, ताही में चित देइ॥
कह 'गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती।
आगे को सुख समुझि, होइ बीती सो बीती॥
 
 
</poeM>
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