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नगर के कोनों के तिकोनों में छिपे है !!
चाँद चांद की कनखियों की कोण-गामी किरनें
पीली-पीली रोशनी की, बिछाती है
सूनेपन की स्याही में डूबी हुई
चाँदनी चांदनी भी सँवलायी हुई है !!
बहते हुए पथरीले नालों की धारा में
धराशायी चाँदनी चांदनी के होंठ काले पड़ गये
चूनरी में अटकी है कंजी आँख गंजे-सिर
टेढ़े-मुँह चाँद चांद की ।
सामने है अँधियाला अंधियाला ताल और
स्याह उसी ताल पर
सँवलायी चाँदनीचांदनी,
समय का घण्टाघर,
ह्रदय में सन्देही शंकाओं के पक्षाघात !!
मद्धिम चाँदनी चांदनी में एकाएक एकाएक
खपरैलों पर ठहर गयी
विभिन्न पोज़ों मे
लेटी थी चाँदनीचांदनी
सफे़द
फैली थी
चाँदनी चांदनी !
नीमों की शाखों के सहारे
आँगन आंगन में उतरकर
कमरों में हलके-पाँव
शहर के कोनों के तिकोने में छुपी हुई
चाँदनीचांदनी
सड़क के पेड़ों के गुम्बदों पर चढ़कर
हँस पड़ा ख़तरनाक
चाँदनी चांदनी के चेहरे पर
गलियों की भूरी ख़ाक
छायाएँ चली दो
मद्धिम चाँदनी चांदनी में
भैरों के सिन्दूरी भयावने मुख पर
ज़िन्दगी का प्रश्नमयी थरथर
थरथराते बेक़ाबू चाँदनी चांदनी के
पल्ले-सी उड़ती है गगन-कंगूरों पर ।
गगन की कालिमा से
बूँदबूंद-बूँद बूंद चू रहा
तडित्-उजाला बन !!
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