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07:11, 3 मार्च 2019
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टह-टह जे इंजोरिआ हलतोर चुप्पी अनोर हो गेलोकन्ने ऊ पराएल हे,रात करिआ से गोर हो गेलोसपना का हूँ, मन के सजल बसतीभरम पाल-पोस के अप्पनकाहे तो नुकाएल हे॥असरा एगो लत्तर इयाद के समुन्नर मेंसरेख कइली हल।जिनगी साज के लहर उमगे।कुछ फूल खिले मनकेकुछ घाम उगे, लहके॥सुरके न, कनहूँ से राग के असरा,आखर जे कढ़ल अनकलतोरे आँगछ से अन्हरिओ इंजोर हो गेलो॥कनिआँ सन लजाएल हे॥बादर के करेजा मेंअनके, मलका मलकेओठ से बात जब छलक जैतो तब कहिह,जे गीत बुनल महकेहिरदा में जब धमक जैतो फूल निअनमनफेर अरथ खनके॥गन्ह के छाँह से सिरजल सिनेह के छँहरीअब लालो परसबन्नाजेठ के लूक-पहर जुड़-झकोर हो गेलो॥काहे तो सेराएल हे॥फिनसे अमरइआ गुदगुदी मन केछाती में दरद उगलोभरम खोल सबके कह देतो,पीअर फूलल सरसो-तोर मातल मुठान से अइसन लग रहलो।देहेअब, हरदी लगलो॥बहाना बना के मत जिआन बेर करऽ।अलता तोर अँचरा में, मेंहदी मेंऊ साँसो समाएल हे॥हमर मन के भोर हो गेलो॥
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