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<poem>
वे सब मेरे लिए स्वादिष्ट मगर काँटेदार मछलियों की तरह हैं
मैंने जब-जब खाना चाहा उन्हें तब-तब काँटें मेरे गले में फंस गए
उकताकर मैंने मछलियाँ खाना छोड़ दिया
जिस भोजन को जीमने का शऊर न हो उसे छोड़ देना ही अच्छा है

अब मछलियाँ पानी में तैरती हैं
मैं उन्हें दूर से देखती हूँ
दूर खड़े होकर तैरती हुई रंग-बिरंगी मछलियाँ देखना
मछलियाँ खाने से ज़्यादा उत्तेजक अनुभव है

जीभ का पानी चाहे कितना भी ज़्यादा हो
उसमें डूबकर अधमरे होने की मूर्खता बार-बार दोहराई नहीं जा सकती ।
</poem>
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