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नशा पिएँ भन्थें दशा पिइएछ / वियोगी बुढाथोकी

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नशा पिएँ भन्थें दशा पिइएछ
बोल्ने ओठलाई आफैँ सिइएछ

प्रेमको खोला तर्न भेट्न बोलाएँ
मायाको बदला चोट दिइएछ

मातिएका पाइला लर्खराएथे
होस् खुल्दा उनकै ओत लिइएछ

अठोटको लौरो टेक्दै धेरै धाएँ
बित्थामा निर्दोष पैताला खिइएछ ।