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बंजर धरती पर / महेश उपाध्याय

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मरुथली लहरियाँ मन के भीतर
आँखें पोखर
तन पर श्रम-सीकर

शीशे की टूटती रेखाएँ
उभरती शिराएँ
साबित है कौन जिसे—
चाव से दिखाएँ

काटे दिन फटी धूप सीकर
रातें बोकर
बंजर धरती पर