भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

मांगत / अर्जुनदेव चारण

Kavita Kosh से
Neeraj Daiya (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 05:08, 19 जनवरी 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: <poem>औजार मत दै वे नीं खोलै मन रा भेद हथियार मत दै नीं जांणै जोड़ण री …)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

औजार मत दै
वे नीं खोलै मन रा भेद
हथियार मत दै
नीं जांणै जोड़ण री अटकळ ।

खुद नै देखूं
जीवूं
समझूं
रीस-हार रा उछब मनावूं
हेत-प्रीत में म्हैं गम जावूं
मिनखीचारै नै बिड़दावूं
एक कवि दै
मिनख छवि दे ।