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अंगिका रामायण / चौथा सर्ग / भाग 12 / विजेता मुद्‍गलपुरी

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जब ढेर दिन पर मित्र से मिलन भेल
ढेर-ढेर तक दुख-सुख बतियैलका।
शृंगी आरो शान्ता के रोॅ आसिर-बचन कहि
अपनोॅ आवै के भी प्रयोजन बतैलका।
कुछ दिन राजा दशरथ परिवार संग
रोमपाद घर ‘अंगदेश’ में बितैलका।
शान्ता आरो शृंगी के अवध लेॅ चलै के लेली
राजा दशरथ तब अनुमति पैलका॥111॥

अवध के तब मुख्य पथ के सजैलोॅ गेलै
काते-कात स्वस्तिक-शंख बनवैलकै।
ठाम-ठाम स्वागत में बनल तोरण द्वार
ओकरा में स्वागत के शब्द लिखैलकै।
शंख ध्वनि, घंटा आरो नगारा गूँजी उठल
ठाम-ठाम ढोल-ढाक दुंदुंभि बजैलकै।
रसता निहारै सब शृंगी आगमन के रोॅ
भाट सिनी शृंगी केक महातम सुनैलकै॥112॥

पहिलोॅ रथोॅ पे दशरथ तीनों रानी संग
जेकरोॅ उपर ज्ञानी सारथी सुमंत छै।
दोसरोॅ रथोॅ पे शान्ता-शृंगी छै विराजमान
जगत में जिनकर यश के न अंत छै।
तेसरोॅ रथोॅ पे अंगरक्षक सवार भेल
जिनकोॅ आयुध डरें कंपित दिगंत छै।
चौथा-पाँचवा रथोॅ पे सैनिक सवार भेल
सब एक पर एक बड़ गुनवन्त छै॥113॥

शृंगी दशरथ से प्रसन्न भेल नर-नारी
सादर सम्मान सब पूजन करलकै।
शृंगी आगमन से नगर धन्य-धन्य भेल
सब पुरवासी बड़ी आनन्द मनैलकै।
यज्ञ के मुहुरत बिचार करै शृंगी ऋषि
यज्ञ के रोॅ तिथि माह फागुन बतैलकै।
रानी सिनी संग शान्ता आनन्द मगन रहै
साल भर सुख से अवध में बितैलकै॥114॥

दोहा -

शान्ता छेकै शान्ति के, जानोॅ सगुन स्वरूप।
धन्य अवध वासी बनल, देखि शान्ति के रूप॥20॥

शान्ति के सगुण रूप शान्ता के जे ध्यान करै
अपने सहज ही समाधि लगि जाय छै।
व्यथित बेचैन जौने शान्ति के तलाश करै
शृंगी-शृंगी सुमरतें शान्ति मिली जाय छै।
सब दुख टारै, दुरभिक्ष से उबारै, निज-
भाग सहियारै, जौने शृंगी कथा गाय छै।
भौतिक दुखोॅ में जौने शृंगी सुमिरन करै
सब उलझन के निदान मिली जाय छै॥115॥

अंगिका रामायण
शृंगी विवाह खण्ड
चौथा सर्ग पूर्ण