भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अंधी चील का बसेरा / पंख बिखरे रेत पर / कुमार रवींद्र

Kavita Kosh से
Sharda suman (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 03:01, 15 जुलाई 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=कुमार रवींद्र |अनुवादक= |संग्रह=प...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

और कितने दिन रहें मुर्दाघरों में

वही गुंबज
वही अंधी चील का
उसमें बसेरा
छावनी है धूपघर की
और है गहरा अँधेरा

उम्र सूरज की बँटी है आँकड़ों में

आँख सोने की सभी की
और मुर्दा सैरगाहें
अक्स लाशों के शहर में
किस तरह इनसे निबाहें

चुप खड़े हैं शंख टूटे मंदिरों में

एक टापू है अनोखा
रह रहे उसमें लुटेरे
हर तरफ बीमार जलसे
लोग मरते मुँह-अँधेरे

पूछते दिन - भोर क्यों है बीहड़ों में