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अइसी वइसी बहस कै रही / भारतेन्दु मिश्र

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अइसी वइसी बहस कै रही
गाँवन केरि जवानी
ट्वाला-ट्वाला अलग हुइ रहे
सबकी अपनि कहानी।

थ्वारा पढ़ि-लिखि कै घरहे-मा
हुइगे आलिम-फाजिल
राजनीति का अरथु न जानैं
हुइगे दल मा सामिल
गाँजा औ दारू मइहाँ
मरिगा आँखिन का पानी।

अपन फायदा देखि रहे सब
अतनी भवै तरक्की
सबकी फिकिर करै वाले का
नाँव धरे हैं झक्की
ई ट्वाला के दिलजानी।

जाति धरम के चौराहेन पर
अब चलती हैं लाठी
गदहा क्यार बार बनवावैं
कउनौ माँगै काठी
केतनेव भये फैसले
मुलू या जनता एकु न मानी।