भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अक्स अपने आइने का / कुमार रवींद्र

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 08:40, 24 मई 2011 का अवतरण (नया पृष्ठ: {{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार= कुमार रवींद्र |संग्रह=और...हमने सन्धियाँ कीं / क…)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उठो शाश्वत !
रात बीती
वक़्त है यह जागने का

हाँ, सुनो तो
नीम पर कौव्वा
किसी से लड़ रहा है
उधर तोता
कुछ अधूरे मंत्र पिछले
पढ़ रहा है

नए युग के
मंत्र क्या हैं
समय है यह जानने का

आओ, देखो
यह गिलहरी
कहाँ चढ़ती जा रही हे
उधर मधुमक्खी
अनूठे कैक्टस के फूल पर
मँडरा रही है

धूप में कैसा
सुनहला दिख रहा है
घर हमारे सामने का

यहाँ देखो
लॉन पर कैसे बिछे हैं
हरे मोती
यहीं पिडुकी है गुलाबी
चुग रही जो
झरे मोती

दिप रहा है
सूर्य जैसा
अक्स अपने आइने का