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अखबार की एक कतरन पर बुरी खबर / रॉक डाल्टन

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इन दिनों मेरे दोस्तों की मौत होती है
तो सिर्फ उनके नाम मर जाते हैं.

इस सड़े से बिल में
उम्मीद करूँ भी तो कैसे
अखबारी कागज़ से कुछ ज्यादा जज्ब करने की,
उन नाजुक काले अक्षरों की जगरमगर को
कैसे समझूं स्मृतियों में चुभते किसी तीर से ज्यादा ?

सिर्फ वे ही इज्जत बख्श सकते हैं लाशों को
जो रहते हैं जेल से बाहर,
प्रियजनों की लाशों से लिपटकर
सिर्फ वे ही कम कर सकते हैं अपना गम,
कब्र को खुरच सकते हैं अपने नाखूनों से
और आंसुओं से नम कर सकते हैं उसकी मिट्टी को.

यह सब नहीं कर पाते हम जैसे जेल के कैदी :
हम बस सीटी बजाते हैं अपने होंठों से
खबर के असर को कम करने के लिए.
......................................................
अनुवाद : मनोज पटेल