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अगर ये ज़िद है कि मुझ से दुआ सलाम न हो / ज़मील मुरस्सापुरी

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अगर ये ज़िद है कि मुझ से दुआ सलाम न हो
तो ऐसी राह से गुज़रो जो राह-ए-आम न हो

सुना तो है कि मोहब्बत पे लोग मरते हैं
ख़ुदा करे कि मोहब्बत तुम्हारा नाम न हो

बहार-ए-आरिज़-ए-गुल्गूँ तुझे ख़ुदा की क़सम
वो सुब्ह मेरे लिए भी कि जिस की शाम न हो

मिरे सुकूत को नफ़रत से देखने वाले
यही सुकूत कहीं बाइस-ए-कलाम न हो

इलाही ख़ैर कि उन का सलाम आया है
यही सलाम कहीं आख़िरी सलाम न हो

‘जमील’ उन से तआरूफ़ तो हो गया लेकिन
अब उन क बाद किसी से दुआ सलाम न हो