भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अगर सुबह भी / श्रीप्रसाद

Kavita Kosh से
Lalit Kumar (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 12:56, 20 फ़रवरी 2017 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=श्रीप्रसाद |अनुवादक= |संग्रह=मेरी...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

सूरज की किरणें आती हैं
सुंदर कलियाँ खिल जाती हैं
अंधकार सब खो जाता है
सब जग सुंदर हो जाता है

चिड़ियाँ गाती हैं मिल-जुलकर
बहते हैं उनके मीठे स्वर
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी
चलती है जैसे मस्तानी

यह प्रातः की सुख-बेला है
धरती का सुख अलबेला है
नई ताजगी, नई कहानी
नया जोश पाते हैं प्राणी

खो देते हैं आलस सारा
और काम लगता है प्यारा
सुबह भली लगती है उनको
मेहनत प्यारी लगती जिनको

मेहनत सबसे अच्छा गुण है
आलस बहुत बड़ा दुर्गुण है
अगर सुबह भी अलसा जाए
तो क्या जग सुंदर हो पाए।