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अजनबी आँखें / अली सरदार जाफ़री

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अजनबी आँखें
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सारी शामें उनमें डूबीं
सारी रातें उनमें खोयीं
सारे साग़र उनमें टूटे
सारी मय
ग़र्क़ उन आँखों में है
देखती हैं वो मुझे लेकिन बहुत बेगानावार।