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अजिर में खेलत हैं दोउ भैया / स्वामी सनातनदेव

राग देवगिरि, ताल झूमरा 9.8.1974

अजिर में खेलत हैं दोउ भैया।
गौर स्याम की अद्भुत सुखमा हुलसि-हुलसि निरखहिं दोउ मैया॥
मणि-आँगन में चलहिं घुटुरुअन, हरसहिं निरखि-निरखि परछैया।
करहिं रारि प्रतिविम्बहुँ सों दोउ, हँसहिं हँसावहिं दै किलकैया॥1॥
भाँति-भाँति के कनक क्रीडनक, मोहन को भावै अति गैया।
कबहुँ छिनाय लेत दाऊ तो सुबकि-सुबकि रोवहि नँद छैया॥2॥
मैया लै कनिया चुचकारत, हलरावत करि लाड़-लड़ैया।
बड़े भाग्य पायो सुख ऐसो, वारि-वारि असु[1] लेत बलैया॥3॥

शब्दार्थ
  1. प्राण