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अतृप्त नैन / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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38
अतृप्त नैन
सिंचित मन-प्राण
पावन रूप
तुम सर्दी की धूप
खिला रूप अनूप।
39
तमाम उम्र
खाते रहे हैं धोखे
सुधरे नहीं
कोई तो है आज भी
तूफानों में साथ है।
40
खुले हैं पन्ने
जीवन की पोथी के
दिल में बसे
कोई एक पृष्ठ तो
रखना मेरे वास्ते।
41
कोई है मौन
सीमाओं से भी परे
बाँधता मन
करता है झंकार
कम्पित हर तार।
42
गुंजित हुए
सप्त स्वर मन में
सिहरा तन
पोर -पोर यौवन
धार बन उमड़ा।
43
छू लेना मुझे-
मलय पवन ज्यों
चुपके आए
साँसों में आ समाए
अंक से लग जाए।