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अनहद-नाद / सुदर्शन प्रियदर्शिनी

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चहचहाटें...
और पैजनियों-सी
आहटें...
जहाँ कल तक
रून झुन
ठुमकती थी....।

आज सब कुछ
अकेलेपन के
सन्नाटे की
दस्तक
हो गई है...।

ऊब अनाहट-सी
आहट भी
अनहद-नाद
बन ठनकती है।