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अनुरागी अधर / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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67
जोगिया नभ
अनुरागी अधर
मद छलके।
68
साँझ उतरी
खिंच गया सन्नाटा
यादें छलकीं ।
69
जड़े हैं ताले
सौ -सौ चुप्पी बनके
खड़े तनके।
70
पाल समेटे
सफर हुआ पूरा
द्वीप अजाना।
71
दूर वन में
चीख़ कलेजा चीरे
लगा तुम हो!
72
आओ यों करें-
बचे पल जितने,
जीभर जिएँ ।
73
दीप -से जलें
गहन निशा छाई
उजेरा करें।
74
कोहरा छँटा
अपने -पराए का
भेद भी जाना।
75
निकष तुम
रिश्तों की उतरी है
झूठी कलई ।
76
वक्त ने कहा-
माना मैं बुरा सही
छली तो छूटे।