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अनूठी झाँकी स्यामा-स्याम की / स्वामी सनातनदेव

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ध्वनि, व्रज के लोक-गीत, कहरवा 26.6.1974

अनूठी झाँकी स्यामा-स्याम की।
जा हिय में विलसै यह जोरी, तापै चलै न एकहुँ कामकी॥
तन-मन की सुधि-बुधि बिसरावनि,
हिय में प्रीति-सुधा सरसावनि,
कन-कनमें रति-रस दरसावनि,
यह सुखमा है स्यामा-स्याम की॥1॥
अग-जग की जो ममता छोरै,
विषय-विमुख मन हरि में जोरै,
निज की निजता तृनसम तोरै,
तापै कृपा होय छवि-धामकी॥2॥
जब लौं हिय सुख-कनिका करसै,
मुक्तिहुँ की महिमा कछु दरसै,
निज की निजता नैंकहुँ परसै,
तब लौं ललक न ललित ललामकी॥3॥
सब तजि जुगल-सरन जब आवै,
निज बलको बल हूँ विसरावै,
पल-पल जुगल जोति ही ध्यावै,
तो रति-मति पावै रस-धामकी॥4॥
यह रति ही साँची सम्पति है,
यहाँ न मुनिजन हूँ की गति है,
होत यहाँ निजताकी छति है,
फिर विलसत रति स्यामा-स्याम की॥5॥
जो बड़भागी यह रस पावै,
ताकी गति कोइ बिरलो पावै,
रसनिधि हूँ ताको रस ध्यावै,
[1] तामें रति रह प्रानाराम की॥6॥

शब्दार्थ
  1. फिर