भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

अन्धेरा घिर आने पर / आरती मिश्रा

Kavita Kosh से
अनिल जनविजय (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 04:22, 14 अगस्त 2016 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=आरती मिश्रा |अनुवादक= |संग्रह= }} {{KKCat...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

मैं अपनी चेतना को उतारकर
रद्द हो चुके कपड़ों की तरह फेंक देना चाहती हूँ
इन दिनों वही करना चाहती हूँ
जैसा तुम कहते जाओ
तुम्हारी हथेलियों की तपन को फैलाकर नस-नस में
पकड़कर उँगली
चलते जाना चाहती हूँ
शहर के आख़िरी छोरवाली झोपड़ी तक
आज, अन्धेरा घिर आने की परवाह किए बग़ैर