भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

अपनी ही खुद्दारियों से क्या ज़रा घायल हुए / अनिरुद्ध सिन्हा

Kavita Kosh से
Rahul Shivay (चर्चा | योगदान) द्वारा परिवर्तित 17:12, 13 मार्च 2018 का अवतरण ('{{KKGlobal}} {{KKRachna |रचनाकार=अनिरुद्ध सिन्हा |अनुवादक= |संग्रह...' के साथ नया पृष्ठ बनाया)

(अंतर) ← पुराना अवतरण | वर्तमान अवतरण (अंतर) | नया अवतरण → (अंतर)
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

अपनी ही खुद्दारियों से क्या ज़रा घायल हुए
हर गली, कूचे में चर्चा है कि हम पागल हुए

खिड़कियाँ खामोश हैं सब आहटें सहमी हुईं
क्या वजह है चील कौवे गिद्ध सब चंचल हुए

मौसमों के आइने में खंजरों के अक्स थे
आज भी ताज़ा हैं दिल में हादिसे जो कल हुए

काग़ज़ी पौधे यहाँ इतने लगाए हैं कि अब
दफ़्तरों में फ़ाइलों के हर तरफ़ जंगल हुए

प्रेम के कुछ इस तरह होते थे अपने ही मिज़ाज
आँख से टपके हुए आँसू भी गंगाजल हुए