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"अब आग के लिबास को / कुँअर बेचैन" के अवतरणों में अंतर

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अब आग के लिबास को ज़्यादा न दाबिए,
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सुलगी हुई कपास को ज़्यादा न दाबिए ।
  
अब आग के लिबास को ज्यादा दाबिए।
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ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें,
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यों आदमी की प्यास को ज़्यादा दाबिए ।
चटके हुए गिलास को ज्यादा न दाबिए।
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मुमकिन है खून आपके दामन पे जा लगे
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ज़ख़्मों के आस पास यों ज्यादा न दाबिए।
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पीने लगे न खून भी आँसू के साथ-साथ
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यों आदमी की प्यास को ज्यादा दाबिए।
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19:31, 30 जुलाई 2015 के समय का अवतरण

अब आग के लिबास को ज़्यादा न दाबिए,
सुलगी हुई कपास को ज़्यादा न दाबिए ।

ऐसा न हो कि उँगलियाँ घायल पड़ी मिलें,
चटके हुए गिलास को ज़्यादा न दाबिए ।

चुभकर कहीं बना ही न दे घाव पाँव में,
पैरों तले की घास को ज़्यादा न दाबिए ।

मुमकिन है ख़ून आपके दामन पे जा लगे,
ज़ख़्मों के आसपास यों ज़्यादा न दाबिए ।

पीने लगे न ख़ून भी आँसू के साथ-साथ,
यों आदमी की प्यास को ज़्यादा न दाबिए ।