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अब सखि! हरि बिनु कछु न सुहात / स्वामी सनातनदेव

राग जोग, तीन ताल 9.9.1974

अब सखि! हरि बिनु कछु न सुहात।
स्याम बिना सूनो जग लागत, का घर-वरकी बात।
डगर-बगर अरु जमुन-कूलमें जहाँ-जहाँ तनु जात-
चितपै चढ़्यौ रहत चितचोर हि, सूझत और न बात॥1॥
घर आवन में होत गहरु[1] तो गुरुजन बहु बतियात।
कहा कहों उनसों या मन की, बात न कछु बनिआत॥2॥
तात-मात समुझावहिं बहु विधि, तदपि न हमहिं सुहात।
उनके हित के बोल बान सम बेधहिं हियो बलात्॥3॥
लोक-लाज कुल कानि गई सब, तदपि न हरि विसरात।
गारी हूँ अब लगहि न खारी, प्यारी सुरति सतात॥4॥
असन-वसन की सुरति न मन में, नैननि नींद न आत।
मन-पंछी उड़ि-उड़ि पुनि-पुनि सखि! स्यामहि के ढिग जात॥5॥
अब जो होनी होय होय, कछु रही न बस की बात।
ये तन-मन तो भये स्याम के, और न कछु अब भात॥6॥

शब्दार्थ
  1. देरी